धर्मशाला, 27 अक्टूबर । भारत के भूगोल की अधूरी समझ के कारण भारतीय राष्ट्रबोध भी अधूरा रह जाता है। भारतीय राष्ट्रबोध की सम्पूर्ण समझ के लिए भारत के अधिक्रांत क्षेत्रों को समझना आवश्यक हो जाता है। यह बात मंगलवार को हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने कही। वह कश्मीर अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित ‘जम्मू-कश्मीर अधिमिलन सप्ताह 2026’ के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि दृढ़ता और संवाद विरोधाभासी गुण नहीं हैं, अपने मत पर दृढ़ रहते हुए भी निरंतर संवाद की प्रक्रिया को गतिमान बनाए रखना चाहिए। व्यक्तिगत और राष्ट्रीय हितों को पूरा करने के लिए आज के दौर में दृढ़ता एवं संवाद का सुमेल आवश्यक हो गया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया पहले की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसलिए शोधार्थियों एवं शोध केंद्रों को दस्तावेजीकरण पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
इस कार्यक्रम में विशेषज्ञ वक्ता के रूप में बोलते हुए इंडिया फाउंडेशन के निदेशक कैप्टन आलोक बंसल नें कहा कि अधिक्रांत क्षेत्र में अचानक से जनसांख्यिकीय परिवर्तन में तेजी देखी गई है, जिसमें बड़ी संख्या में अधिक्रांत क्षेत्रों से बाहर के व्यक्ति इन क्षेत्रों में आकर बस रहे हैं, यह भारत के लिए एक चिंता का प्रमुख विषय बनता जा रहा है। कैप्टन बंसल नें इस बात को भी रेखांकित किया कि भारत के इन अधिक्रांत क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पाकिस्तान द्वारा अपने हितों की दृष्टि से बड़े स्तर पर किया जा रहा है, जबकि इन क्षेत्रों के मूल निवासियों को इन संसाधनों के दोहन का कोई लाभ नहीं दिया जाता।
कार्यक्रम में कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. मलकीत सिंह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर अधिमिलन सप्ताह पिछले छः वर्षों में अकादमिक विमर्श का एक बड़ा अवसर बनकर उभरा है। उन्होंने कहा कि इस साप्ताहिक व्याख्यानमाला में जम्मू-कश्मीर से संबंधित सम-सामयिक विषयों पर गहन विमर्श किया जाता है।
कार्यक्रम में अधिष्ठाता अकादमिक प्रो. प्रदीप कुमार और अधिष्ठाता समाज विज्ञान स्कूल प्रो. कंवर चंद्रदीप सिंह सहित हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य, शोधार्थी, विद्यार्थी उपस्थित रहे। देश के विभिन्न हिस्सों से विशेषज्ञ भी उपस्थित रहे।
