नई दिल्ली, 09 जनवरी (हि.स.)। सुप्रीम कोर्ट की 7 सदस्यीय संविधान बेंच ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) का अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा समाप्त करने के लिए दायर याचिका पर आज से सुनवाई शुरू की। आज सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी शैक्षणिक संस्थान को केवल इसलिए अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने से नहीं रोका जा सकता है क्योंकि यह एक कानून द्वारा रेगुलेट होता है। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान बेंच इस मामले पर कल यानी 10 जनवरी को भी सुनवाई करेगी।
सुनवाई के दौरान एएमयू की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि भारत में विविधता है, जो दुनिया के किसी भी महाद्वीप से कहीं अधिक है। अगर उत्तर प्रदेश में भी आएं तो यहां विविधता दिखेगी। यही वह चीज है, जिसे हम संरक्षित करना चाहते हैं। धवन ने कहा कि एएमयू एक मान्यता प्राप्त उत्कृष्ट संस्थान है। उन्होंने कहा कि अजीज बाशा के फैसले में कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 30 को लेकर काफी संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया। धवन ने कहा कि एक अल्पसंख्यक संस्थान को संचालित करने का अधिकार उसकी स्थापना के अधिकार से आता है। एएमयू एक्ट को लाने के पीछे उद्देश्य मुस्लिमों को शिक्षित करना था।
धवन ने इस पर सहमति जताई की अल्पसंख्यक संस्थानों को केवल बस्ती के रूप में नहीं होना चाहिए बल्कि उन्हें उत्कृष्ट होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एएमयू उर्दू भाषा का संरक्षण करता है और इसका उल्लेख अनुसूची 8 में है। धवन ने एएमयू कैंपस में मस्जिद, उच्च पदों की नियुक्तियों में मुस्लिमों को वरीयता देने का हवाला देते हुए कहा कि यूनिवर्सिटी का पूरा चरित्र मुस्लिम है। धवन ने कहा कि एएमयू में हर धर्म के छात्र दाखिला के लिए आवेदन दे सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि 12 फरवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 7 जजों की संविधान बेंच को रेफर कर दिया था। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि एएमयू कोर्ट का अंतिम फैसला आने तक मुस्लिमों को दाखिला दे सकता है।
2019 में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने हलफनामा देकर कहा था कि एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। हालांकि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने जामिया यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने की वकालत की थी। 29 अगस्त, 2011 को यूपीए सरकार ने नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस के फैसले पर सहमति जताई थी। वर्तमान केंद्र सरकार ने अपने ताजे हलफनामे में कहा है कि पहले के हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अजीश बाशा केस में दिए गए फैसले को नजरंदाज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय नहीं है क्योंकि इसे ब्रिटिश सरकार ने स्थापित किया था, न कि मुस्लिम समुदाय ने।