नक्सली दहशत में कमी हाेने व पुल-पुलिया बनने से तीन दशक बाद ग्रामीण देवी-देवता के साथ बस्तर दशहरा में हुए शामिल
बस्तर दशहरा एक अच्छा माध्यम बन सकता है, नक्सल प्रभावित इलाकों के ग्रामीणों को अपनी संस्कृति से पुन: जाेडकर प्राेत्साहित करने में
जगदलपुर, 14 अक्टूबर (हि.स.)। बस्तर में नक्सली दहशत जैसे जैसे कम हो रही है वैसे वैसे लोग विकास के साथ-साथ अपनी संस्कृति से जुड़ते चले जा रहे हैं। ऐसी ही एक कहानी नक्सल प्रभावित बारसूर इलाके की है, जहां के लोग लगभग तीन दशक के बाद बस्तर दशहरा में शामिल हाेने जगदलपुर पहुंचे। यहां पहुंचे ग्रामीणों ने बताया कि नक्सल दहशत और गांव के बीच नदी के चलते वे बस्तर दशहरा में शामिल नहीं हो पा रहे थे। जैसे ही यह नक्सल दशहत कम हाेने तथा गांव में विकास के साथ नदी में अब नया पुल बन जाने से इतने सालों बाद बस्तर दशहरा में वे शामिल हो पाएं हैं।
छत्तीसगढ़ शासन-प्रशासन को इस और ध्यान देना चाहिए कि नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के सभी क्षेत्रों से रियासत कालीन समय में जिस तरह से धार्मिक आस्था के साथ बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हाेते थे, लेकिन नक्सलवाद के हावी हाेने के बाद ग्रामीण चाहकर भी नहीं आने वाले इलाकाे काे चिंन्हित कर ग्रामीणाें काे बस्तर दशहरा में शामिल हाेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। नक्सल प्रभावित इलाकों के ग्रामीणों को आस्था के साथ जोड़कर रियासत कालीन परंपराओं के निर्वहन के लिए यदि प्राेत्साहित किया जाता है ताे इन्हें नक्सलवाद से भी दूर किया जा सकता है। इसके साथ ही बस्तर संभाग के नक्सल प्रभावित ग्रामीण इलाकों के ग्रामीणों को बाहरी दुनिया से परिचित होने का एक अच्छा माध्यम बस्तर दशहरा बन सकता है। इस वर्ष बस्तर दशहरा में जिस तादाद में ग्रामीण यहां पहुंचे हैं, वह अन्य वर्षाें की अपेक्षा अधिक है, यह भी नक्सलवाद के कमी हाेने से ग्रामीणाें के उत्साह की ओर इंगित करता है।
मावली माता के साथ पहुंचे पुरुषोत्तम नेगी बताते हैं कि उनके यहां से पिछले तीन दशक से कोई भी बस्तर दशहरा में शामिल नहीं हुआ। जबकि पहले उनके पिता के दौर में गांव के ग्रामीण के सााथ बस्तर दशहरा में शामिल हाेते थे। इसी बीच नक्सल दशहत की वजह से आना बंद हो गया। बस्तर दशहरा में नहीं आने के बाद भी कई बार यहां से निमंत्रण आता रहता था, लेकिन बस्तर दशहरा में शामिल नहीं हाेने का मलाल रहता था। बावजूद इसके परिवार के लोगों ने अपनी परंपरा-संस्कृति से जैसे तैसे जोड़े रखा था। अब इस एतिहासिक दशहरे में शामिल होने का मौका मिल रहा है, यह वाकई बस्तर दशहरा अद्भुत है।
बारसूर से बाहरभुजा देवी लेकर पहुंचे बलदेव ने बताया कि इस बार आस-पास के करीब 25 गांव के लोग यहां अपने 70 से अधिक देवी-देवता के साथ पहुंचे है। इसमें चिटमाता, बारहमंडु, बैंगलुर, समेत अन्य गांव शामिल हैं। वहीं यहां उन्हें ठहरने के लिए राजमहल से सटकर टेंट में जगह मिला है, जो सम्मान की बात है। उनका कहना है कि अब उनका परिवार इस दशहरे में हर साल शामिल होगा।
सुखराम ने बताया कि यहां तक न आने की वजह में एक सबसे बड़ा कारण छिंदनार में पुल का नही होना भी था। नदी में इस समय काफी पानी रहता है, ऐसे में लोग जान जोखिम में डालकर देवी-देवता के साथ नहीं आ सकते थे। लेकिन जैसे ही नक्सल दहशत खत्म हुई तेजी से इलाके का विकास हुआ और अब तो छिंदनार नदी पर पुल भी बन जाने से बस्तर दशहर में शामिल हाे पाये
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