संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर फरीदकोट के मिनी सचिवालय के बाहर किसानों ने केंद्र सरकार के खिलाफ धरना दिया। यह धरना दिल्ली मोर्चे की चौथी वर्षगांठ पर आयोजित किया गया। इस अवसर पर विभिन्न किसान संगठनों के नेताओं ने एकत्र होकर केंद्र सरकार को चेतावनी दी कि यदि उनकी स्वीकार की गई मांगों को तत्काल पूरा नहीं किया गया, तो देशभर के किसान एक बार फिर बड़ा आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे। कौमी किसान यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष बिंदर सिंह गोलेवाला और भारतीय किसान यूनियन के उपाध्यक्ष गुरमीत सिंह के नेतृत्व में इस धरने में कई किसान संगठन जुड़े।
किसानों ने कहा कि जब दिल्ली में किसानों का आंदोलन हो रहा था, तब केंद्र सरकार ने उन पर कई आश्वासन दिए थे, जिसमें मांगे स्वीकार करना शामिल था। लेकिन, बावजूद इसके, अब तक उन मांगों को लागू नहीं किया गया है। इस धरने के जरिए केवल फरीदकोट नहीं, बल्कि पूरे देश में किसानों द्वारा सांकेतिक धरने आयोजित किए जा रहे हैं। यदि सरकार ने इन मुद्दों की ओर ध्यान नहीं दिया, तो किसानों का धैर्य टूट सकता है, और वे एक बार फिर से बड़ा आंदोलन शुरू करने के लिए बाध्य हो जाएंगे।
26 नवंबर 2020 को देशभर के किसान संगठनों ने संयुक्त किसान मोर्चा के तहत दिल्ली में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ अपना प्रदर्शन शुरू किया था। लंबे संघर्ष के बाद केंद्र सरकार ने इन कानूनों को रद्द करने की घोषणा की थी। इस निर्णय के बाद किसान आंदोलन समाप्त हुआ था। अब, नए आंदोलन की संभावनाओं के बीच किसान संगठनों ने एकजुट होकर धरना दिया है, जिससे साफ जाहिर होता है कि किसान अपनी मांगों को लेकर कितने गंभीर हैं।
धरने में शामिल किसानों का कहना है कि उनकी समस्याएं और मांगें फरीदकोट ही नहीं, बल्कि पूरे देश में हैं। किसान नेता बिंदर सिंह गोलेवाला ने कहा कि सरकार को यह याद रखना चाहिए कि किसान हमेशा संगठित होकर अपने हक के लिए लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि पिछले आंदोलन की सीख लेकर किसानों ने अपने संगठन को और मजबूत किया है और आने वाले समय में यदि उनकी मांगे नहीं मानी जाती, तो वे फिर से एकजुट होकर सड़कों पर उतरेंगे।
इस धरने ने किसानों की एकजुटता को प्रगाढ़ किया है और यह संकेत दिया है कि वे अपनी मांगों के प्रति कितने दृढ़ हैं। यदि सरकार उनकी मांगों को जल्द ध्यान में नहीं लेती, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। किसान संगठनों ने इस धरने के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया है कि वे हक की लड़ाई छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं और अगली बार का आंदोलन पहले से भी बड़ा होगा।