पंजाब: नशे के जुर्म में फंसाया युवक, असल में निकली पैरासिटामोल, 2 लाख मुआवजा आदेश!

पंजाब पुलिस ने एक मामले में ऐसी कार्रवाई की है जिसने सभी को चौंका दिया है। सुचना के अनुसार, एक व्यक्ति को पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर ने केवल इस वजह से गिरफ्तार कर लिया कि उसने उसकी गाड़ी को निकलने का रास्ता नहीं दिया। यह मामला तब और गंभीर हो गया जब फॉरेंसिक रिपोर्ट में यह सामने आया कि आरोपी की जेब से कोई नशे की गोलियां नहीं, बल्कि सिर्फ पैरासिटामोल मिला। इस प्रकरण के फलस्वरूप पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश दिया है कि पीड़ित को दो लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही, मुआवजे की आधी राशि उस दोषी सब इंस्पेक्टर राजिंदर सिंह के वेतन से वसूली जाएगी।

यह मामला 25 जून 2024 का है। दरअसल, पीड़ित ने उच्च अदालत में नियमित जमानत के लिए याचिका दायर की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उसे एक गलत मामले में फंसाया गया है, क्योंकि वह एक अधिकारी को साइड नहीं दे पाया था, जो पीछे कार में चल रहा था। पुलिस ने इस संदिग्ध को दो दिन बाद एफआईआर दर्ज की, अर्थात 26 जून को। पीड़ित का आरोप है कि उसे बिना किसी कारण के अवैध तरीके से गिरफ्तार किया गया और उसके परिवार को तक इसकी सूचना नहीं दी गई।

13 सितंबर को यह मामला तब गंभीर मोड़ पर पहुंचा जब पंजाब सरकार ने फॉरेंसिक रिपोर्ट अदालत में पेश की। इसमें यह बताया गया कि जब्त की गई सामग्री वास्तव में एसिटामिनोफेन (पैरासिटामोल) थी, न कि किसी प्रकार की नशीली दवा। इस बीच, आरोपी को हिरासत में रखने की अवधि दो महीने 15 दिन तक चली। हाई कोर्ट ने 13 सितंबर को उसे जमानत दे दी और कहा कि एफएसएल रिपोर्ट कोर्ट को 31 अगस्त को मिल गई थी। इसके बाद, 17 सितंबर को हाईकोर्ट के निर्देश पर उसकी रिहाई सुनिश्चित की गई।

इस मामले पर पंजाब पुलिस के डीजीपी गौरव यादव ने जानकारी दी कि इस मामले में कैंसिलेशन रिपोर्ट दर्ज किया जा चुका है और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। वहीं, उच्च न्यायालय ने इस घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वे पुलिस अधिकारियों की मनमानी से बहुत परेशान हैं। न्यायालय ने ऐसे गंभीर उल्लंघनों को खतरनाक बताया और कहा कि यह कर्तव्य को निभाने में असफलता को दर्शाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दोषी अधिकारियों के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

इस तरह का मामला न केवल पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे एक निर्दोष नागरिक को बिना किसी ठोस आधार के अपराधी बनाया जा सकता है। इस घटनाक्रम ने यह भी साबित कर दिया है कि सही न्याय की प्राप्ति के लिए एक स्वतंत्र न्यायालय की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।