राजस्थान की भजनलाल सरकार ने हाल ही में अपना दूसरा पूर्ण बजट पेश किया है, जिसका आकार 5 लाख 37 हजार करोड़ रुपये है। यह पिछले बजट की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत अधिक है, लेकिन राज्य पर बढ़ते हुए कर्ज की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। वर्ष 2020-21 में राज्य सरकार का कर्ज लगभग 4 लाख करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 7 लाख करोड़ रुपये के पार जाने का अनुमान है। यह स्थिति इस कारण उत्पन्न हुई है क्योंकि बजट का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा वेतन-भत्ते, पेंशन, कर्ज चुकाने और प्रतिदिन के खर्चों में व्यय किया जा रहा है। मुफ्त योजनाओं के तहत भी सरकार पर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ रहा है। जब राज्य की राजस्व आय खर्चों से कम होती है, तब सरकार को कर्ज का सहारा लेना पड़ता है।
राज्य सरकार की आय के प्रमुख स्रोतों में टैक्स और सेवा शुल्क शामिल हैं। इसमें जीएसटी की आय भी महत्वपूर्ण है, परंतु इसके अलावा वैल्यू एडेड टैक्स (वैट), एक्साइज ड्यूटी, स्टैंप ड्यूटी और माइनिंग से भी सरकारी आमदनी होती है। उदाहरण के लिए, राजस्थान में पेट्रोल-डीजल पर वैट वसूला जाता है और इसी प्रकार शराब बिक्री पर एक्साइज ड्यूटी के माध्यम से भी राजस्व प्राप्त होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार के पास कमाई के विविध साधन हैं, बावजूद इसके व्यय संतुलन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
राज्य सरकार की आय का एक बड़ा हिस्सा सरकारी कर्मचारियों और पेंशन भोगियों के वेतन पर खर्च होता है। तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर खर्च किए जाने वाले पैसे में से 30% हिस्सा केवल वेतन पर खर्च होता है और 11% पेंशनों में चला जाता है। इसके अतिरिक्त सामाजिक सेवाएं, कृषि विकास, ब्याज भुगतान, तथा पूंजीगत व्यय जैसे अन्यों में भी धन व्यय किया जाता है, जिससे बजट का संतुलन बनाए रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य बन जाता है।
मुफ्त योजनाओं की बात की जाए, तो राज्य सरकार हर साल इन योजनाओं पर 15 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करती है, जिसमें सबसे अधिक व्यय मुफ्त बिजली पर होता है। सरकार पर आने वाला वित्तीय भार हर क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय वर्ष 2024-25 तक राजस्थान की कर्ज राशि 6.40 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच जाएगी, जो अगले बजट में 7.25 लाख करोड़ रुपये के पार जाने की संभावना है।
राजस्थान का बजट हमेशा केंद्र सरकार के बजट से अलग रहता है। केंद्र सरकार अपने विभिन्न कराधान के माध्यम से आय अर्जित करती है, जबकि राज्य सरकारें अपने विशेष करों, जैसे वैट और स्टांप शुल्क, पर निर्भर करती हैं। इसके अतिरिक्त, बजट तैयार करने की प्रक्रिया लगभग छह महीने पहले से शुरू होती है, जिसमें विभिन्न सुझावों को शामिल किया जाता है। वित्त विभाग के अधिकारियों की एक समिति इस प्रक्रिया को सक्षम बनाती है।
इस प्रकार, राजस्थान का बजट एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें सरकारी खातों की बारीकी से निगरानी और योजना बनानी होती है। यह बात मानने योग्य है कि राज्य सरकार को निरंतर नए उपायों की आवश्यकता है, ताकि वह अपने बजट और कर्ज के संतुलन को बनाए रख सके।