तीन दशक पुरानी पेंशन योजना लागू ना करने पर सुप्रीम कोर्ट की पंजाब सरकार को कड़ी फटकार!

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार को 30 साल पुरानी पेंशन योजना को लागू करने में हुई देर और अदालत को दिए गए कई आश्वासनों से पलटने के लिए कड़ी फटकार लगाई है। उच्चतम न्यायालय की एक पीठ, जिसमें जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुयान शामिल थे, ने पंजाब के मुख्य सचिव और निदेशक पब्लिक इंस्ट्रक्शन (कॉलेज) के उप निदेशक को 5 मार्च को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पंजाब सरकार ने उच्च न्यायालय में दो बार से अधिक योजना को लागू करने का वादा किया, लेकिन इसके बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं आया और समय की बर्बादी होती रही।

यह मामला राजनीश कुमार और अन्य द्वारा दायर याचिका से संबंधित है, जिसमें 1996 में जारी की गई पंजाब प्राइवेटली मैनेज्ड एफिलिएटेड एंड पंजाब गवर्नमेंट एडेड कॉलेजेज पेंशनरी बेनिफिट्स स्कीम को अमल में लाने की मांग की गई थी। हालांकि, यह योजना आज तक लागू नहीं हो पाई है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. पतवालिया, पुनीत जिंदल और गौरव अग्रवाल ने कोर्ट में पैरवी की। अदालत ने पहले भी देखा है कि कैसे पंजाब सरकार ने 26 जुलाई 2001 को आश्वाशन दिया था कि योजना को तीन महीनों के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा, लेकिन जब 2 मई 2002 को उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव अदालत में पेश हुए, तो उन्होंने इसका सही ढंग से पालन न करने पर खेद व्यक्त किया।

सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया कि पंजाब सरकार ने 2002 में अदालत के समक्ष अपने वादों को पूरा करने में विफल रही और इसके बजाय 9 जुलाई 2002 को एक नई योजना पेश की, जिससे नया विवाद उत्पन्न हो गया। उच्च न्यायालय में समय-समय पर दिए गए आश्वासन, जैसे कि 29 जुलाई 2011, 30 सितंबर 2011, 4 नवंबर 2011 और 2 दिसंबर 2011 को भी निरर्थक साबित हुए, क्योंकि 2012 में सरकार ने 1996 की योजना को निरस्त कर दिया था। इस पर कोर्ट ने पंजाब सरकार के उत्तरों को खारिज करते हुए सरकार को चेतावनी दी कि यदि यह स्थिति बनी रहती है, तो कोर्ट सरकारी वकीलों के बयानों को मानने से इंकार कर सकती है।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार के अधिकारियों के झूठे हलफनामों और निरंतर अदालत में दिए गए आश्वासनों से पीछे हटने के रवैये की निंदा की। कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार इसी तरह की रणनीति अपनाती रही, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने ये स्पष्ट किया कि मुख्य सचिव और उप निदेशक को 5 मार्च को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होना अनिवार्य है, अन्यथा उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।