भारतीय अर्थव्यवस्था में भरोसे की बड़ी छलांग

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आर्थिक ताकत और नीतिगत प्रतिबद्धता को मान्यता देने वाला एक विशेष समय सामने आया है। वैश्विक रेटिंग एजेंसी “एसएंडपी ग्लोबल” ने 18 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भारत की दीर्घकालिक सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को ‘बीबीबी-’ से बढ़ाकर ‘बीबीबी’ और अल्पकालिक रेटिंग को ‘ए-3’ से ‘ए-2’ कर दिया है। यह सुधार किसी सामान्य तकनीकी घोषणा भर का मामला नहीं है बल्कि यह उस आर्थिक आत्मविश्वास और नीतिगत स्थिरता का प्रमाण है, जिसे भारत ने निरंतर बनाए रखा है।

दरअसल, वर्ष 2007 के बाद यह पहली बार है जब भारत की रेटिंग में सुधार हुआ है और इस अंतराल में दुनिया की अर्थव्यवस्था ने कई गहरे झटके झेले हैं। 2008 की वैश्विक वित्तीय मंदी, यूरोपीय ऋण संकट, कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और हालिया पश्चिम एशियाई अस्थिरता जैसी चुनौतियाँ भारत के सामने भी थीं, लेकिन इन सबके बीच भारत ने न केवल अपने विकास को स्थिर बनाए रखा बल्कि भविष्य की संभावनाओं को भी और मज़बूत किया। रेटिंग सुधार इसीलिए भारत की नीतिगत क्षमता और आर्थिक लचीलापन दोनों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति है।

बना हुआ है निवेशकों का भरोसा

यह सुधार निवेशकों के लिए एक भरोसे का संदेश है। ‘बीबीबी’ श्रेणी को निवेश ग्रेड माना जाता है और इसका अर्थ यह है कि भारत अपने वित्तीय दायित्वों को समय पर पूरा करने की पर्याप्त क्षमता रखता है। यद्यपि यह रेटिंग अभी ‘ए’ या ‘एएए’ स्तर तक नहीं पहुँची है, लेकिन यह मान्यता महत्वपूर्ण है कि भारत अब उन देशों की श्रेणी में शामिल है जिन्हें सुरक्षित निवेश गंतव्य माना जाता है। अल्पकालिक ‘ए-2’ रेटिंग भी यही बताती है कि भारत की तत्कालीन वित्तीय प्रतिबद्धताओं पर कोई खतरा नहीं है। यह सुधार भारत की उस दीर्घकालिक आर्थिक योजना का हिस्सा है, जिसमें तेज़ जीडीपी वृद्धि, मजबूत मौद्रिक ढाँचा, नियंत्रित मुद्रास्फीति और बुनियादी ढाँचे में भारी निवेश शामिल है।

अगर हालिया आंकड़ों पर नज़र डालें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। वित्त वर्ष 2022 से 2024 के बीच भारत की औसत वास्तविक जीडीपी वृद्धि 8.8 प्रतिशत रही है, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है। एसएंडपी का अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में भी भारत 6.8 प्रतिशत की दर से बढ़ता रहेगा। यह दर उस समय में उल्लेखनीय है जब चीन की वृद्धि दर पाँच प्रतिशत से नीचे जा रही है और यूरोप व अमेरिका की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ मंदी के दबाव से जूझ रही हैं। इसका अर्थ यह है कि भारत वैश्विक विकास का प्रमुख इंजन बन चुका है और आने वाले वर्षों में इसका दबदबा और बढ़ेगा।

राजकोषीय घाटे का कम होना लेकर आया है नई उम्‍मीद

इस वृद्धि के पीछे सरकार का राजकोषीय प्रबंधन और बुनियादी ढांचे पर केंद्रित नीतियां प्रमुख कारण रही हैं। महामारी के दौरान भारत का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 9 से 13 प्रतिशत तक पहुँच गया था। लेकिन अब यह घटकर वित्त वर्ष 2025 में 4.8 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2026 में 4.4 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य है। राज्य सरकारों का घाटा भी अगले तीन-चार वर्षों में औसतन 2.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। केंद्र और राज्यों दोनों को मिलाकर सामान्य सरकारी घाटा 2029 तक 6.6 प्रतिशत पर आ सकता है। यह सुधार न केवल वित्तीय अनुशासन का प्रमाण है बल्कि यह भी बताता है कि सरकार ने बड़े पैमाने पर निवेश को बिना चालू खाता घाटा बढ़ाए सफलतापूर्वक वित्तपोषित किया है। यह भारत की विश्वसनीयता में बढ़ोतरी करने वाला कारक है।

बुनियादी ढांचे पर फोकस ने विकास की गति को कई गुना बढ़ा दिया

बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में किए गए निवेश ने भी भारत की आर्थिक संभावनाओं को एक नई दिशा दी है। वित्त वर्ष 2026 तक केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय 11.2 ट्रिलियन रुपये तक पहुँचने का अनुमान है, जो जीडीपी का 3.1 प्रतिशत होगा। यदि राज्यों को मिलाया जाए तो यह अनुपात 5.5 प्रतिशत तक जाता है। इतनी बड़ी पूंजीगत हिस्सेदारी केवल आँकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह सड़कों, रेलमार्गों, बंदरगाहों, ऊर्जा संयंत्रों और डिजिटल अवसंरचना के निर्माण में परिलक्षित होती है। यह निवेश दीर्घकालिक विकास की बाधाओं को दूर करने में सहायक है। भारत की समस्या लंबे समय तक यही रही कि यहाँ बुनियादी ढाँचे की कमी विकास की गति को रोक देती थी। अब केंद्र की मोदी सरकार इस कमी को व्यवस्थित रूप से दूर कर रही है और इसका लाभ उद्योग, व्यापार और नागरिकों सभी को मिलेगा।

मुद्रास्फीति पर नियंत्रण और मौद्रिक नीति की स्थिरता इस रेटिंग सुधार के दूसरे बड़े कारण हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2015 से मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण का ढाँचा अपनाया, जिसमें 2 से 6 प्रतिशत के बीच खुदरा मुद्रास्फीति रखने का लक्ष्य है। पिछले तीन वर्षों में औसतन मुद्रास्फीति 5.5 प्रतिशत पर रही है और हाल के महीनों में यह घटकर 2 प्रतिशत के करीब आ गई है। जुलाई 2025 में मुख्य सीपीआई मुद्रास्फीति केवल 1.6 प्रतिशत रही, जो वैश्विक ऊर्जा मूल्य अस्थिरता के बावजूद उल्लेखनीय है। यही कारण है कि फरवरी 2025 में रिजर्व बैंक ने नीतिगत रेपो दर को घटाकर 5.5 प्रतिशत कर दिया। मुद्रास्फीति नियंत्रण का यह अनुभव निवेशकों को भरोसा देता है कि भारत में मूल्य अस्थिरता आर्थिक विकास की राह में बाधा नहीं बनेगी।

रेटिंग सुधार से अंतरराष्ट्रीय बाजार से सुविधाएं मिलना तय

विदेशी निवेशकों के लिए भारत अब और अधिक आकर्षक बन गया है। रेटिंग सुधार का सीधा अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार से भारत को सस्ता ऋण मिलेगा। इससे न केवल सार्वजनिक परियोजनाओं की फंडिंग आसान होगी बल्कि निजी क्षेत्र को भी अधिक अवसर मिलेंगे। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और पोर्टफोलियो निवेश दोनों में वृद्धि की संभावना है। निवेशकों की नजर में स्थिर नीतियाँ और भरोसेमंद संस्थागत ढाँचा सबसे बड़ा आकर्षण होता है। भारत ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। चाहे दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता हो, जीएसटी जैसी कर सुधार व्यवस्था हो या डिजिटलीकरण की पहल, इन सबने भारत की अर्थव्यवस्था को पारदर्शी और कुशल बनाने में योगदान दिया है।

बढ़ती प्रतिष्ठा का संकेत

रेटिंग सुधार का एक गहरा राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व भी है। यह केवल आर्थिक आँकड़ों की मान्यता नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा का भी संकेत है। दुनिया की बड़ी कंपनियाँ और निवेशक जब यह देखते हैं कि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ भारत की रेटिंग सुधार रही हैं, तो उनका विश्वास और बढ़ता है। यह सुधार भारत की छवि को उभरते हुए आर्थिक शक्ति से एक स्थिर और भरोसेमंद शक्ति में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत इस अवसर का उपयोग दीर्घकालिक सुधारों को आगे बढ़ाने में कर पाएगा? रेटिंग सुधार केवल एक आरंभ है, अंत नहीं। इसे बनाए रखने और आगे बढ़ाने के लिए भारत को राजकोषीय अनुशासन को और मज़बूत करना होगा, निर्यात विविधीकरण करना होगा, हरित ऊर्जा और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देना होगा तथा सामाजिक क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा। विकास तभी टिकाऊ और सार्थक होगा जब वह समाज के हर वर्ग तक पहुँचे।

अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एसएंडपी का रेटिंग सुधार भारत के लिए भरोसे का एक प्रमाण-पत्र है। यह प्रमाण-पत्र केवल भारत सरकार के आर्थिक प्रबंधन का ही नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता और भारतीय समाज के लचीलापन का भी है। यह अवसर है कि हम इस विश्वास को और गहरा करें और आने वाले वर्षों में भारत को ऐसी स्थिति में पहुँचाएँ, जहाँ उसकी रेटिंग और ऊपर जाए और वह दुनिया की सबसे स्थिर और शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाए। कहना होगा कि इस भरोसे को बनाए रखना ही अब भारत की सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए।