प्रयागराज, 29 मार्च । सरल संस्कृत मे लिखित पुस्तक ‘शब्द स्वरूप विमर्श:’ भारतीय ज्ञान परम्परा के निगूढ़ तत्वों पर प्रकाश डालती है। भारतीय चिंतन परंपरा में शब्द को ब्रह्म कहा गया है।
उक्त बातें रविवार को सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय प्रयागराज में चल रहे शताब्दी समारोह के दूसरे दिन समारोह को संबोधित करते हुए पुस्तक के लेखक सर्वार्य इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काशी प्रान्त के प्रान्त प्रचार प्रमुख डॉ मुरारजी त्रिपाठी ने कही। उन्होंने कहा कि इसमें शब्दब्रह्म के स्वरूप का बहुत बारीकी से विवेचन किया गया है जिसे बहुत आसानी से समझा जा सकता है। ऋषियों के चिन्तन की ग्रंथियों को इसमे खोला गया है। कबीर ने कहा- साधो, शब्द साधना कीजै। जेहि शब्द ते प्रगट भए सब सोई गहि लीजै। पुस्तक का यही प्रतिपाद्य है। भारत के प्राचीन विश्वविद्यालयो में आचार्यो का विषय के अनुसार वर्गीकरण, पढ़ाई जाने वाली 14 विद्याओं की विभिन्न शाखाएं, प्रसिद्ध विश्वविद्यालयो के ऋषिकल्प कुलपतियों के नाम तथा उनकी शिक्षण पद्धति आदि का इसमें विस्तृत विवेचन किया गया है। वाणी के 4 स्तर परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी की पर्तों को इसमे खोला गया है.। भाषा विज्ञान के छात्रों अनुसंधाताओ तथा भारतीय संस्कृति एवं उसकी ज्ञान परंपरा में रुचि रखने वालों के लिए पुस्तक अत्यंत उपयोगी है।
सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय में चल रहे शताब्दी समारोह के दूसरे दिन मंच पर डॉ मुरारजी त्रिपाठी द्वारा लिखित’शब्द स्वरूप विमर्श ‘: पुस्तक का लोकार्पण किया । पूर्व जिलाधिकारी आई ए एस डॉ सुरेंद्र कुमार पांडे, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व व्याकरण विभागाध्यक्ष प्रोफेसर भगवत शरण शुक्ल हिंदी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री कुंतक मिश्र सुरुचि तिवारी आचार्य शंभू नाथ त्रिपाठी अंशुल ने पुस्तक का लोकार्पण किया।