वर्षा जल को सहेजने की होनी चाहिए ईमानदार कोशिश

अमित राव पवार

जीवन में प्रकृति-पर्यावरण ने हमें बहुत कुछ दिया है तथा बदले में प्रकृति हमसे थोड़ी-सी कुछ अपेक्षा रखती है। उसमें भी हम मनुष्य शायद खरा नहीं उतर पा रहे हैं। हम इतना तो कर ही सकते हैं कि वर्षा जल को ही सहेज लें। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुए समय समय पर इसका ध्यान रखा। इसके लिए हम सदैव उनके ऋणी रहेंगे। अब कुछ आधुनिकता के चलते हम अपनी संस्कृति, परंपराओं तथा प्रकृति को अनदेखा करते जा रहे हैं, जिसका परिणाम हम सबको समय-समय पर दिखाई पड़ता है। ग्लोबल वार्मिंग, जल का स्रोत निम्न स्तर पर जाना, गर्मी में अधिक तापमान इत्यादि कारण जो हमें सामने दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं में सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात आज जल बचाने की है।

देखा जाए तो जन्म से ही मनुष्य अपने आप को बहुत चालाक, चतुर और समझदार समझता था, हर जगह मानो उसकी हुकूमत हो, किंतु प्रकृति इस मनुष्य से भी कई अधिक चतुर, चालाक और समझदार निकली, जिसने दो महत्वपूर्ण काम वायु-जल अपने हाथों में ही रखे। और यह दोनों ही चीज मनुष्य कभी निर्माण (काल्पनिक हो सकती हैं) नहीं कर सकता, इन दोनों के लिए मनुष्य को प्रकृति के साथ रहकर ही कार्य करना पड़ेगा! अधिक पेड़ लगाने होंगे तथा वर्षा का पानी सहेजना होगा जिससे जल के स्तर को बढ़ाया जा सके अन्यथा हालात अभी आरंभ ही हुए हैं, नहीं तो दुष्परिणामों और संकट की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। अभी हाल ही में गर्मी ने अपना रुद्र तापमान रूप दिखाया जिससे हाहाकार मच गया, विचार करें कि पानी का पर्याप्त मात्रा में न मिले तो क्या होगा?

दुनिया के हर जीव को जीने के लिए जल की आवश्यकता होती है। एक अध्ययन के मुताबिक मनुष्य पांच दिन बिना कुछ खाए रह सकता है किंतु बिना पानी के एक दिन भी नहीं। आज भी अनेक देश और राज्य ऐसे हैं जो पानी के संकट से जूझ रहे हैं। जल की खपत लगातार जनसंख्या वृद्धि के कारण बढ़ती जा रही है, वहीं इसकी उपलब्धता में कमी दिखाई पड़ती है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए शासन-प्रशासन सरकारें सब अपना काम कर रहे है, लेकिन इतने भर से काम चलनेवाला नहीं है। वास्तव में यह प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह जल का अपव्यय न करे, इसे सहेज कर रहे। कोई भी सरकार आ जाए, कितने ही कानून बन जाएं पर हम जल को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं, इसलिए यह ध्यान में रखकर ही हम जल का अपने जीवन में सही उपयोग करेंगे दैनन्दिन जीवन में व्यवहार करें और भूजल स्तर को बढ़ाने में अपना योगदान दे सकते हैं।

इसके लिए जो कार्य आज से ही शुरू करने हैं, वह हैं जल को बचाएं , पेड़ लगाएं, हमारी छतों से हर वर्ष लाखों-करोड़ों लीटर पानी बह जाता है, इस बहते पानी को हम सहज सकते हैं दो या तीन तरह से। छत पर आने वाले वर्षा जल को एक फिल्टर के माध्यम से सीधे नलकूप में उतारकर, रूफ हार्वेस्टिंग सिस्टम, सोकपिट बनाकर, अन्य किसी विधि द्वारा। आसानी पूर्वक जैसा हम कर सकते हैं जिससे जल बहकर न जाते हुए भूमि के अंदर जाए जिससे जल के स्तर को बढ़ाया जा सके। इस तरह से हम सभी जल को सहेज सकते हैं।

सच यही है कि वर्षा और पेड़ों से ही भूजल स्तर को बढ़ाया जा सकता है। आज देश के कितने ही नगरों में जल को लेकर हाहाकार मचा हुआ है, विकास के नाम पर सीमेंट का जाल बिछाया जा रहा है। दूर-दूर तक पेड़-पौधों का नाम तक नही, जल होगा तो सप्लाय होगा या जल की व्यवस्था होगी तभी शासन-प्रशासन सरकारें कुछ कर पाएंदी अन्यथा हम कितने ही आंदोलन करें, कितने ही ज्ञापन दें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। हम भूमि से जल निकाल ही रहे हैं उसे दे कुछ नहीं रहे। नदिया सिकुड़ रही हैं, तालाब सूख रहे हैं, बावड़ियां अब पोस्टरों पर दिखाई देती हैं। इसलिए अभी समय रहते हम सबको संभलना होना अन्यथा आने वाले समय में जल के लिए भीषण लड़ाइयां और युद्ध तय है।

वस्तुत: हम सभी को यह ध्यान रखना होगा कि जल को हम बना या निर्माण नहीं कर सकते, इसलिए वर्षाकाल में हम सभी मिलकर यह प्रयास करें कि जल को सहेजेंगे, इसे सहेजने की भूमि के जल स्तर बढ़ाने की, और अधिक से अधिक पेड़ लगाने तथा उसे सुरक्षित रखते हुए पौधे से पेड़ बनने तक रखरखाव की जिम्मेदारी लेंगे । तभी हम आने वाली पीढ़ी को कुछ देकर जा पाएंगे। अन्यथा आज जो हम वायु-जल उपयोग कर रहे हैं, यह तो हमें हमारे पूर्वजों के कारण मिला है। हमारा इस प्रकति में फिर क्या योगदान है? इस पर भी हम सभी गहनता से विचार करेंगे ही ।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)