कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा व सम्मान जरूरी: हरविन्द्र कल्याण

चंडीगढ़, 21 अप्रैल । हरियाणा विधानसभा सचिवालय की ओर से मंगलवार को ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ के प्रति जागरूक करने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। हरियाणा विधानसभा स्पीकर हरविन्द्र कल्याण और डिप्टी स्पीकर डॉ. कृष्ण लाल मिड्ढा की उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम में पंजाब विश्वविद्यालय के कानून विभाग की चेयरपर्सन डॉ. वंदना अरोड़ा ने विषय विशेषज्ञ के तौर पर प्रस्तुति दी।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधानसभा स्पीकर हरविन्द्र कल्याण ने कहा कि कार्य स्थल पर महिलाओं के सम्मान की रक्षा का विषय सामाजिकता, नैतिकता के साथ-साथ कानूनी जिम्मेदारी के साथ जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि विधानसभा प्रदेश स्तर तक कानूनी निर्माण की सर्वोच्च संस्था है। यहां के सभी कर्मचारी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कानून निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि जागरुकता से बेहतर कानून का निर्माण होता है तो प्रशिक्षण से हमारी कार्य क्षमता बढ़ती है। सभ्य नागरिक परिवार, समाज और अपने कार्यस्थल पर आदर्श भूमिका का निर्वहन करता है। महिला की सुरक्षा और सम्मान का विषय आता है तो हमें इस दृष्टिकोण से सोचना होगा कि जब हमारी बेटियां कार्य के लिए बाहर जाती हैं, तो हम कैसा वातावरण चाहते हैं।

डिप्टी स्पीकर डॉ. कृष्ण लाल मिड्ढा ने अनेक रीति रिवाजों और परंपराओं का उदाहरण देते हुए भारतीय समाज में मातृशक्ति के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. मिड्ढा ने कहा कि जिस घर में नारी शक्ति मुस्कुराती है, लक्ष्मी वहां स्वयं चलकर आती हैं। उन्होंने कहा कि लड़कियां अपने पिता और पति दोनों परिवारों की खुशहाली चाहती हैं।

पंजाब विश्वविद्यालय के कानून विभाग की चेयरपर्सन डॉ. वंदना अरोड़ा ने कहा कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम संबंधी कानून पहली बार सर्वोच्च न्यायालय की ओर से 1997 में जारी ‘विशाखा दिशा-निर्देशों’ के बाद अस्तित्व में आया। बाद में भारतीय संसद ने ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (पॉश अधिनियम) पारित किया। यह अधिनियम सार्वजनिक, निजी, संगठित, असंगठित सभी क्षेत्रों पर लागू होता है। इसके तहत दस या इससे अधिक कर्मचारियों वाले संगठनों को एक आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) का गठन करना होता है। जिला स्तर पर स्थानीय शिकायत समितियां (एलसीसी) उन मामलों को संभालती हैं जहां आईसीसी उपलब्ध नहीं है। इस समितियों के पास दीवानी अदालतों के समान शक्तियां हैं।