हरिद्वार, 18 मई । उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.रमाकान्त पाण्डेय ने कहा कि संस्कृत को केवल धर्म और कर्मकांड से जोड़कर देखना सीमित दृष्टिकोण है। संस्कृत भारत की हजारों वर्षों पुरानी बौद्धिक,सांस्कृतिक और वैज्ञानिक परंपरा की संवाहक भाषा रही है।
सोमवार को लेखक गांव, थानों में पूर्व शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की अध्यक्षता में आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा एवं विकसित भारत में संस्कृत का योगदान’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
इस दौरान प्रो.रमाकान्त पाण्डेय ने कहा कि संस्कृत साहित्य में विज्ञान,गणित,चिकित्सा, खगोलशास्त्र,नाट्यकला और दर्शन का अद्भुत भंडार मौजूद है। उन्होंने आर्यभट्ट,भास्कराचार्य, वराहमिहिर,सुश्रुत और चरक के ग्रंथों का उल्लेख करते हुए संस्कृत की वैज्ञानिक समृद्धि पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि पाणिनि के व्याकरण का अध्ययन आज कंप्यूटर साइंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संदर्भ में भी किया जा रहा है। साथ ही आदि शंकराचार्य द्वारा देश के चारों दिशाओं में चार धाम स्थापित कर सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का उल्लेख भी किया।
इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय और स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय के बीच भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर भी किए गए।