भारतवंशी को नोबेल सम्मान, ट्रंप की छटपटाहट

ओस्लो की बर्फीली वादियों से लेकर वाशिंगटन के गलियारों तक, इन दिनों नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप की छटपटाहट देखने लायक है। आलम ये है कि पुरस्कार न मिलने के गम में ट्रंप की रातों की नींद और दिन का चैन पूरी तरह उड़ चुका है। इस बार तो हद ही हो गई। एक भारतवंशी महिला नवी पिल्लई को क्या नोबेल मिल गया, ट्रंप की छाती पर जैसे सांप लोटने लगा। न्यूयॉर्क की एक रैली में तो उनका यह दर्द सरेआम छलक पड़ा, जहां वे इस कदर भड़के कि नॉर्वे के इस फैसले को इतिहास का सबसे बड़ा ‘अमिट कलंक’ घोषित कर दिया। उनकी इस हालत को देखकर राजनीतिक गलियारों में लोग चुटकियां ले रहे हैं और कई तो दबी जुबान में कहने लगे हैं कि नोबेल के इस अंधाधुंध लालच ने उन्हें दुनिया के सामने हंसी का पात्र और राजनीति का एक चलता-फिरता ‘जोकर’ बना दिया है।

ट्रंप का गुस्सा इस बात पर है कि दुनिया को अमन-चैन का पाठ पढ़ाने वाले असली ‘महात्मा’ तो वही थे लेकिन पुरस्कार किसी ऐसी ‘रहस्यमयी महिला’ को दे दिया गया जिसे उनके मुताबिक कोई जानता तक नहीं। सोशल मीडिया पर तो उन्होंने बाकायदा रोना रोते हुए लिखा कि अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर यह पुरस्कार सीधे उनके हाथों में आना चाहिए था लेकिन कुछ कट्टरपंथियों ने उनके साथ बहुत बड़ा धोखा कर दिया। अपनी इस छटपटाहट में ट्रंप ने ऐसा मजेदार गणित पेश किया है, जिसे सुनकर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट के जज भी सिर पकड़ लें। उन्होंने बड़े भोलेपन से दावा ठोक दिया कि अपने महान कामों के लिए उन्हें एक-दो नहीं बल्कि पूरे आठ नोबेल शांति पुरस्कार मिलने चाहिए थे।

अब ट्रंप की इस अनोखी लिस्ट को देखिए, जिसमें उन्होंने भारत-पाकिस्तान से लेकर इजरायल-हमास तक, दुनिया के उन तमाम देशों के नाम गिना दिए हैं जिनके बीच का सदियों पुराना विवाद उन्होंने सिर्फ अपने एक ट्वीट या जादुई मुस्कान से सुलझा देने का दावा किया है। उनका मानना है कि दुनिया भर के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रात को सोते समय सिर्फ नोबेल कमेटी को पत्र लिखते हैं कि ‘हुजूर, पुरस्कार देना तो सिर्फ ट्रंप साहब को ही देना!’ हालांकि, असलियत यह है कि जिन देशों में शांति कराने का सेहरा वे अपने सिर बांध रहे हैं, वहां आज भी लोग सुबह उठकर सबसे पहले यह चेक करते हैं कि कहीं कोई नया बम तो नहीं गिर गया। लेकिन ट्रंप तो अपनी ही धुन में मगन हैं; उनका दावा है कि रूस-यूक्रेन का युद्ध तो वे अपनी ‘बुलेट ट्रेन’ जैसी रफ्तार से बस खत्म ही करने वाले थे कि बीच में नोबेल वालों ने सारा खेल खराब कर दिया।

दूसरी तरफ, ओस्लो की कमेटी ने चुपचाप अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मजबूत करने और युद्ध अपराधों के खिलाफ जीवन भर लड़ने वाली भारतीय तमिल मूल की नवी पिल्लई के नाम पर मुहर लगा दी। पिल्लई ने सालों तक अदालतों में नरसंहार के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी, लेकिन शायद वे यह भूल गईं कि असली शांति तो रैलियों के मंच पर खड़े होकर बड़े-बड़े दावे करने से आती है। ट्रंप की इस बेबसी और छटपटाहट को देखकर अब दुनिया भर के कार्टूनिस्टों और व्यंग्यकारों की चांदी हो गई है। लोग हंस रहे हैं कि जो शख्स खुद हर वक्त बातों से बारूद बरसाता रहता हो, वह शांति का मसीहा बनने के लिए इस कदर बेताब है। देखना यह है कि ट्रंप की इस उड़ चुकी नींद को वापस लाने के लिए ओस्लो की कमेटी कोई नया ‘ट्रंप स्पेशल नोबेल’ बनाती है या फिर ट्रंप खुद ही प्लास्टिक का चमचमाता मेडल खरीदकर छाती पर टांग लेते हैं।