बलरामपुर, 10 अक्टूबर । बलरामपुर जिले के रामानुजगंज स्थित बालक हाई स्कूल मैदान में शनिवार को शिव शिष्य हरिन्द्रानन्द फाउंडेशन के तत्वावधान में विराट शिव गुरु महोत्सव का आयोजन किया गया। आयोजकों के अनुसार, महोत्सव में 25 हजार से अधिक शिव शिष्य शामिल हुए।
छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के अलावा झारखंड और उत्तर प्रदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। कार्यक्रम में कृषि मंत्री रामविचार नेताम, उनकी पत्नी पुष्पा नेताम, पूर्व विधायक बृहस्पत सिंह और नगर पालिका अध्यक्ष रमन अग्रवाल मौजूद रहे।
महोत्सव में मुख्य वक्ता दीदी बरखा आनंद ने भगवान शिव के गुरु स्वरूप की अवधारणा पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भगवान शिव केवल नाम के नहीं, बल्कि काम के भी गुरु हैं। उनके अनुसार, जिस तरह भगवान शिव के औढरदानी स्वरूप से धन, धान्य और संपदा प्राप्त करने की मान्यता है, उसी तरह उनके गुरु स्वरूप से ज्ञान प्राप्त करने का भाव भी महत्वपूर्ण है। ज्ञान के अभाव में संपत्ति और संसाधनों का उपयोग नुकसानदायक हो सकता है।
दीदी बरखा आनंद ने कहा कि भगवान शिव को गुरु मानने के लिए किसी धर्म, जाति, संप्रदाय या लिंग की बाध्यता नहीं है। उनके अनुसार, मन से शिव को गुरु स्वीकार करना ही शिष्यता की शुरुआत है। उन्होंने शिव शिष्य बनने के तीन सूत्र बताए। इनमें मन ही मन शिव को गुरु मानकर उनसे कृपा की प्रार्थना करना, दूसरे लोगों को भी शिव के गुरु स्वरूप से परिचित कराना और मन ही मन गुरु शिव को प्रणाम करना शामिल है। उन्होंने कहा कि इसके लिए किसी तरह के आडंबर या औपचारिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
कार्यक्रम में भैया अर्चित आनंद ने शिव शिष्यता की अवधारणा के विस्तार के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि शिव शिष्य साहब हरिन्द्रानन्द ने वर्ष 1974 में भगवान शिव को अपना गुरु माना था। इसके बाद 1980 के दशक तक यह अवधारणा देश के विभिन्न क्षेत्रों में फैलने लगी। हरिन्द्रानन्द और दीदी नीलम आनंद जी ने जाति, धर्म, लिंग और संप्रदाय से परे सभी लोगों को भगवान शिव के गुरु स्वरूप से जुड़ने का संदेश दिया।
महोत्सव को लेकर रामानुजगंज में व्यापक तैयारियां की गई थीं। कई शिव शिष्य एक दिन पहले से ही आयोजन स्थल पर पहुंचने लगे थे। व्यवस्था संभालने के लिए करीब एक हजार महिला स्वयंसेवक पीली साड़ी में और लगभग 500 पुरुष स्वयंसेवक काली पैंट व सफेद शर्ट में तैनात रहे। पूरे आयोजन के दौरान भगवान शिव को गुरु मानने की अवधारणा और इस आध्यात्मिक संदेश को जन-जन तक पहुंचाने पर जोर दिया गया।
