अर्जुन सिंह का सार्वजनिक जीवन और लोकतांत्रिक परंपराओं में योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा : नरेंद्र सिंह तोमर

भोपाल, 05 नवंबर । मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता स्वर्गीय अर्जुन सिंह की जयंती पर गुरुवार, को विधानसभा के सेंट्रल हॉल में आयोजित पुष्पांजलि कार्यक्रम में उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और सार्वजनिक जीवन में योगदान का स्मरण किया गया।

इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, विधायक अजय अर्जुन सिंह और उनके परिवारजनों सहित जनप्रतिनिधियों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। वहीं, इस दौरान अर्जुन सिंह के राजनीतिक जीवन, प्रदेश के विकास, सामाजिक न्याय, शिक्षा के विस्तार, सांस्कृतिक चेतना और लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत बनाने में उनकी भूमिका को रेखांकित किया गया।

विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि स्वर्गीय अर्जुन सिंह का व्यक्तित्व और कृतित्व सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनुकरणीय रहा है। पूरा प्रदेश और देश उनके योगदान से परिचित है। उनका राजनीतिक जीवन लंबा रहा और उन्होंने प्रदेश तथा राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। उनके सार्वजनिक जीवन के अनुभव और कार्यों को सदैव याद किया जाता रहेगा।

अर्जुन सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन में सामाजिक रूप से कमजोर, पिछड़े और वंचित वर्गों के हितों को भी प्रमुखता दी। सार्वजनिक जीवन में उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही, जिन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक कल्याण के विषयों को भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। 4 मार्च 2011 को उनका निधन हो गया था, किंतु मध्य प्रदेश की राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और सांस्कृतिक संस्थाओं के विकास में उनके योगदान की चर्चा आज भी होती है।

विधानसभा में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में विधायक भगवानदास सबनानी, विधायक अजय अर्जुन सिंह, परिवार के सदस्य, जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक तथा विधानसभा के अधिकारी-कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी ने पुष्पांजलि अर्पित कर उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया।

उल्लेखनीय है कि स्वर्गीय अर्जुन सिंह का जन्म पांच नवंबर 1930 को मध्य प्रदेश के सीधी जिले के चुरहट में हुआ था। उनके पिता का नाम राव शिव बहादुर सिंह था। उन्होंने इलाहाबाद और आगरा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की तथा बीए और एलएलबी की उपाधि हासिल की। छात्र जीवन से ही सामाजिक गतिविधियों और सार्वजनिक कार्यों में उनकी रुचि रही। वर्ष 1957 में पहली बार मध्य प्रदेश विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इसके बाद लगभग पांच दशक तक उनका राजनीतिक जीवन सक्रिय रहा। उन्होंने राज्य मंत्रिमंडल में विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी संभाली और शिक्षा, कृषि, सामान्य प्रशासन तथा योजना एवं विकास जैसे क्षेत्रों में काम किया। वर्ष 1977 में वे मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बने।

अर्जुन सिंह जून 1980 में पहली बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और मार्च 1985 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल में सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के कल्याण तथा प्रदेश के विकास से जुड़ी योजनाओं को आगे बढ़ाया गया। शहरी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों को भूमि पर पट्टाधिकार देने की पहल भी उनके शासनकाल की उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल रही।

वर्ष 1985 में वे दोबारा मुख्यमंत्री निर्वाचित हुए, परंतु पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किए जाने के बाद उन्होंने पद छोड़ दिया। उस समय पंजाब आतंकवाद और उग्रवाद की चुनौती से गुजर रहा था। राज्यपाल के रूप में उन्होंने वहां शांति और सद्भाव स्थापित करने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फरवरी 1988 से जनवरी 1989 तक उन्होंने फिर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला।

अर्जुन सिंह के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष कला, साहित्य और संस्कृति के प्रति उनकी गहरी रुचि भी रहा। उनके कार्यकाल में मध्य प्रदेश में संस्कृति को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हुए। भोपाल स्थित भारत भवन की स्थापना और उसे बहुआयामी कला केंद्र के रूप में विकसित करने के पीछे उनके राजनीतिक संरक्षण और सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारत भवन ने साहित्य, चित्रकला, रंगमंच, संगीत और जनजातीय कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का मंच उपलब्ध कराया। उनके सहयोग से प्रदेश में संस्कृति विभाग को स्वतंत्र पहचान देने की पहल भी हुई।

राष्ट्रीय राजनीति में भी अर्जुन सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे केंद्र सरकार में वाणिज्य और संचार मंत्री रहे। वर्ष 1991 में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाए गए और बाद में 2004 से 2009 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार में इसी मंत्रालय का दायित्व संभाला। इस दौरान उच्च शिक्षा के क्षेत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालयों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी), भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (एनआईटी) के विस्तार को गति मिली।

वर्ष 2016 में उनके स्मृति व्याख्यान में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी उच्च शिक्षा के विस्तार में अर्जुन सिंह की भूमिका का उल्लेख किया था। उन्होंने बताया था कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 21 नए केंद्रीय विश्वविद्यालय, आठ आईआईटी, सात आईआईएम और दस एनआईटी जुड़े। राष्ट्रपति ने उनके पांच दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन और वंचित वर्गों के उत्थान के प्रति प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया था।