शिमला, 06 नवंबर । हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस के सहायक उपनिरीक्षक (एएसआई) पुनीत शर्मा का निलंबन आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि स्थानांतरण के बाद नई तैनाती पर ड्यूटी ज्वाइन नहीं करने के लिए उन्हें अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उनके तत्कालीन नियंत्रण अधिकारी ने खुद उन्हें कार्यमुक्त नहीं करने की जिम्मेदारी ली थी। न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ ने तीन नवंबर को यह आदेश देते हुए पुनीत शर्मा को 24 जून 2026 के स्थानांतरण आदेश के अनुसार चौथी भारतीय रिजर्व बटालियन (आईआरबीएन) जंगलबेरी में तत्काल ड्यूटी ज्वाइन करने के निर्देश दिए।
पुनीत शर्मा यातायात, पर्यटक एवं रेलवे (टीटीआर) शाखा शिमला में तैनात थे। 24 जून को पुलिस महानिदेशक ने उनका स्थानांतरण चौथी आईआरबीएन जंगलबेरी कर दिया था। इसके बाद 30 जून को उन्होंने स्थानांतरण रद्द करने के लिए आवेदन दिया। इसमें उन्होंने अपनी मां को पेट का कैंसर होने, पत्नी के नौकरी करने और बेटे के स्कूल में पढ़ने का हवाला दिया। उन्होंने वर्तमान इकाई में छह महीने से कम समय से तैनात होने और अपने सेवा रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया।
तत्कालीन नियंत्रण अधिकारी और टीटीआर शाखा के पुलिस उपमहानिरीक्षक संजीव गांधी ने एक जुलाई को पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर स्थानांतरण रद्द करने की सिफारिश की थी। उन्होंने पुनीत शर्मा के सेवा रिकॉर्ड को ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा वाला बताया। साथ ही टीटीआर शाखा में कर्मचारियों की कमी और पुनीत की पारिवारिक परिस्थितियों का उल्लेख किया। डीआईजी ने यह भी स्पष्ट किया था कि आवेदन पर निर्णय होने तक उन्हें कार्यमुक्त करने की प्रक्रिया रोक दी गई है।
20 जुलाई को पुलिस महानिदेशक ने पुनीत शर्मा को दो आधारों पर निलंबित कर दिया। पहला, स्थानांतरण के बाद नई तैनाती पर ड्यूटी ज्वाइन नहीं करना और दूसरा, कांस्टेबल चालक पंकज की शिकायत। पंकज ने आरोप लगाया था कि पुनीत ने उनकी कांगड़ा में अस्थायी तैनाती को लेकर उन्हें परेशान किया और मानसिक प्रताड़ना दी। शिकायत में निजी कार साफ करने का दबाव बनाने का आरोप भी लगाया गया था।
23 जुलाई को डीआईजी संजीव गांधी ने पुलिस महानिदेशक को रिपोर्ट भेजकर इन आरोपों पर स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने कहा कि कांस्टेबल पंकज की कांगड़ा में अस्थायी तैनाती उनके कार्यालय ने प्रशासनिक जरूरत के आधार पर की थी। इसमें पुनीत शर्मा की कोई भूमिका नहीं थी। उन्होंने यह भी बताया कि पुनीत को कार्यमुक्त नहीं करने का निर्णय उनके कार्यालय ने लिया था। स्थानांतरण रद्द करने की सिफारिश लंबित होने के कारण कमांड प्रमाणपत्र जारी नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानांतरण के पालन में देरी के लिए पुनीत को अकेले जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। कांस्टेबल की शिकायत भी निलंबन का पर्याप्त आधार नहीं थी। अदालत ने यह भी पाया कि तीन महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी पुनीत को आरोपपत्र नहीं दिया गया था, जबकि 15 अक्टूबर को विभागीय जांच के लिए जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया गया। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना।
हाईकोर्ट ने 20 जुलाई का निलंबन आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, पुनीत को पुरानी तैनाती पर लौटने की अनुमति नहीं दी गई है। उन्हें जंगलबेरी में नई तैनाती पर ड्यूटी ज्वाइन करनी होगी। स्थानांतरण से जुड़ी अन्य शिकायतों के लिए अदालत ने उन्हें कानून के अनुसार उचित उपाय अपनाने की छूट दी है।
