कमल हासन की डांट से पूनम ढिल्लन की आदतें सुधरी, साउथ इंडस्ट्री का अनुशासन सीखा!

पूनम ढिल्लन ने हाल ही में साउथ इंडियन सिनेमा के दिग्गज अभिनेता कमल हासन के साथ अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा बताया जब एक बार उन्हें सेट पर समय पर नहीं पहुंचने के कारण कमल हासन ने सख्ती से डांटा था। पूनम ने यह भी कहा कि वह ऐसे समय में काम कर रही थीं जब बड़े सुपरस्टार्स अक्सर समय की पाबंदी को नजरअंदाज करते थे, जिससे उन्हें भी इसी आदत में ढलने का मौका मिला।

इंटरव्यू में पूनम ने कहा कि उन्होंने कमल हासन के साथ कुछ प्रमुख फिल्में जैसे ‘ये तो कमाल हो गया’, ‘यादगार’, और ‘गिरफ्तार’ की हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि साउथ इंडस्ट्री में काम करते-करते उन्होंने समय और अनुशासन का महत्व समझा। पूनम ने बताया कि जब वह पहली बार सेट पर देरी से पहुंचीं, तो उन्हें इसकी गंभीरता का अहसास हुआ। मुंबई में, जहां वह काम करती थीं, 30-45 मिनट की देरी आम थी और इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। लेकिन कमल हासन ने उन्हें चेतावनी दी कि सेट पर समय का कितना महत्व है।

पूनम ने एक उदाहरण साझा किया जब वह चेन्नई में एक शूटिंग पर थीं। उन्हें सुबह 7 बजे सेट पर पहुंचना था, लेकिन वह 8 बजे पहुंचीं। उन्होंने इसे कोई बड़ी बात नहीं समझा, लेकिन जब वह वहां पहुंचीं, तो कमल हासन ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से समझाया कि अन्य तकनीशियनों और सहयोगियों ने कितनी मेहनत की थी। उन्होंने बताया कि अन्य सदस्य सुबह 5 बजे या उससे पहले उठकर अपने कार्य के लिए निकले थे और उन्हें पूनम का इंतजार करना पड़ा। यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण सीख थी कि किसी भी टीम का एक हिस्सा होने के नाते समय की पाबंदी कितनी आवश्यक है।

पूनम ने साउथ इंडस्ट्री में काम करने के अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि वहाँ यूनिट के सदस्यों का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। उन्होंने बताया कि शूटिंग के दौरान जब भोजन परोसा जाता था, तो केवल मुख्य कलाकार ही नहीं, बल्कि पूरी यूनिट एक साथ भोजन करती थी। इससे एक सहानुभूतिपूर्ण और सहयोगी माहौल बनता है। पूनम के अनुसार, भारतीय सिनेमा में यह एक सकारात्मक बदलाव की दिशा में कदम है कि सभी को समान प्राथमिकता दी जाए।

कमल हासन की फिल्मी यात्रा के बारे में बताते हुए, पूनम ने कहा कि उन्होंने 1970 के दशक में अपने करियर की शुरुआत की थी और जल्द ही दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में उनके भावी स्टारडम की नींव पड़ी। फिर 1980 के दशक में, ‘एक दूजे के लिए’ और ‘सागर’ जैसी फिल्मों के माध्यम से वह बॉलीवुड में भी अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। उनके योगदान ने पूरे भारतीय सिनेमा पर गहरा प्रभाव डालने का कार्य किया है।

इस प्रकार, पूनम ढिल्लन का अनुभव समस्त युवा कलाकारों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत है, जो साझा करता है कि अनुशासन और समय की पाबंदी कितनी महत्वपूर्ण होती है, खासतौर पर जब आप किसी बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा होते हैं।