नैनीताल, 14 मार्च । उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में हिन्दू नव वर्ष (चैत्र मास) की शुरुआत मेष संक्रांति, फूल संक्रांति या फूलदेई के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व बसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है। इस वर्ष यह पर्व 15 मार्च को पूरे उत्तराखंड में उत्साह व परंपरागत तरीके से मनाया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि फूलदेई का सीधा संबंध प्रकृति से है। फूलदेई केवल एक पर्व नहीं बल्कि कुमाऊँ की लोक संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामुदायिक परंपराओं का प्रतीक है, जो हर वर्ष बसंत के साथ नए उत्साह और उमंग लेकर आता है। इस समय पहाड़ों में बुरांश, फ्यूंली (प्योंली), आड़ू, खुबानी आदि पद्म प्रजाति के पेड़ों और अन्य जंगली फूलों से प्रकृति सजी रहती है। खेतों में सरसों खिलती है और चारों ओर हरियाली दिखाई देती है। इसलिए यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार और सम्मान व्यक्त करने का भी प्रतीक माना जाता है।
ऐसे मनायी जाती है फूलदेई
इस दिन सुबह छोटे बच्चे जंगलों से प्योंली, बुरांश और अन्य फूल चुनकर लाते हैं। वे फूल, चावल और पत्तों से सजी थाली या टोकरी लेकर गांव के हर घर की देहरी (दहलीज) पर जाकर फूल अर्पित करते हैं और लोकगीत गाते हुए घर की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। लोकगीत की पारंपरिक पंक्तियाँ इस प्रकार गाई जाती हैं:
“फूलदेई, छम्मा देई,
जतुकै देला, उतुकै सही।
दैंणी द्वार, भर भकार,
सास ब्वारी, एक लकार,
यो देलि सौ नमस्कार…”
बदले में घरों के लोग बच्चों को गुड़, चावल और पैसे देते हैं। इन चावल और गुड़ से शाम को ‘सई’ (चावल के आटे का हलवा) बनाया जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।