छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 8 कर्मचारियों की बर्खास्तगी को सिरे से किया खारिज

रायपुर, 17 अप्रैल । छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आज अपने एक आदेश में साइंस एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल के 8 कर्मचारियों की बर्खास्तगी को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने साफ कहा कि किसी भी कर्मचारी को बिना सुनवाई और उचित जांच के नौकरी से निकालना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी भी है।

बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय ने पाया कि अधिकारियों ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया। कर्मचारियों को बिना किसी उचित जांच और सुनवाई के सीधे नौकरी से निकाल दिया गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नियमित होने के बाद ये कर्मचारी संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत कानूनी सुरक्षा के हकदार थे। इस अनुच्छेद के अनुसार, किसी भी सरकारी कर्मचारी को बिना उचित जांच के सेवा से नहीं हटाया जा सकता।

उच्च न्यायालय ने 21 सितंबर 2020 के सेवा समाप्ति आदेश और 17 मार्च 2021 के अपील आदेश को मनमाना तथा अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। इसके साथ ही सभी 8 कर्मियों को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है।

यह पूरा विवाद साल 2012 से शुरू हुआ था। भोजेश्वर चंद्राकर, भूपेश कुमार निषाद और अशोक गायकवाड़ समेत 8 लोगों की नियुक्ति कलेक्टर दर पर भृत्य के पद पर हुई थी। दो साल का प्रोबेशन खत्म होने के बाद जब इन्होंने नियमितीकरण की मांग की, तो अफसरों ने राहत देने के बजाय उनके वेतन में ही कटौती कर दी। मामला जब उच्च न्यायालय पहुंचा, तो अदालत ने वेतन कटौती को गलत बताते हुए अधिकारियों को नियमितीकरण पर विचार करने को कहा था।

अदालत के आदेश के बाद अफसरों ने प्रक्रिया सुधारने के बजाय, नियुक्ति में ही खामियां निकाल दीं और साल 2020 में इन सभी को नौकरी से बाहर कर दिया। मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने अब कड़े शब्दों में कहा कि अधिकारी यह साबित करने में नाकाम रहे कि कर्मचारियों ने धोखाधड़ी से नौकरी पाई थी। नियमित होने के बाद कर्मचारियों को संविधान के अनुच्छेद 311 (2) के तहत सुरक्षा मिलती है, जिसे नजरअंदाज किया गया। 6-7 साल की सेवा के बाद किसी को भी बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के इस तरह असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता।

कर्मचारियों की ओर से अधिवक्ता तारेंद्र कुमार झा, विनय पांडेय, रवि कुमार भगत और भास्कर झा ने पैरवी की। उन्होंने अदालत को बताया कि कैसे शासन ने 21 सितंबर 2020 और 17 मार्च 2021 को मनमाने आदेश जारी कर गरीब कर्मचारियों का हक छीना था।उच्च न्यायालय ने इन दोनों आदेशों को निंदनीय और मनमाना मानते हुए निरस्त कर दिया है।