नई दिल्ली, 28 अप्रैल । दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में आज नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) पर चर्चा के दौरान पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि यह विधेयक देश की आधी आबादी को उनका संवैधानिक अधिकार दिलाने का ऐतिहासिक प्रयास था। उन्होंने कहा कि लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा और विधान परिषदों में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की दिशा में यह एक निर्णायक कदम था, लेकिन कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, डीएमके और अन्य विपक्षी दलों ने मिलकर इस ऐतिहासिक अवसर को बाधित करने का कार्य किया।
सिरसा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य किया है। पंचायतों में 50 प्रतिशत आरक्षण के माध्यम से लाखों महिलाएं आज निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनी हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक विकास के क्षेत्र में प्रभावी नेतृत्व कर रही हैं। उन्होंने कहा कि यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक महिला सहभागिता मॉडल का उदाहरण है।
सिरसा ने कहा कि देश की 50 प्रतिशत आबादी को उनका अधिकार देने के लिए प्रधानमंत्री ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाये। यदि यह विधेयक पूर्ण रूप से लागू होता, तो लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत हमारी बहन-बेटियां निर्णय लेने वाली भूमिका में होतीं। यह केवल आरक्षण नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र को और मजबूत करने का कदम था। उन्होंने महिला आरक्षण विधेयक के ऐतिहासिक संदर्भ को रखते हुए कहा कि 1996 से लेकर 2010 तक कई बार इस विधेयक को आगे बढ़ाने का प्रयास हुआ, लेकिन कांग्रेस ने बार-बार इसे रोकने का काम किया। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी चार बार इसे सदन में लाने का प्रयास किया, परंतु विपक्ष के विरोध के कारण यह सफल नहीं हो सका।
उन्होंने कहा कि 2010 में राज्यसभा से विधेयक पारित होने के बाद देश की महिलाओं को उम्मीद जगी थी, लेकिन कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने उसे लोकसभा तक पहुंचने नहीं दिया। 2023 में जब प्रधानमंत्री मोदी ने इसे फिर आगे बढ़ाया, तब भी विपक्ष ने हिचकिचाहट और राजनीतिक स्वार्थ के साथ इसका विरोध किया।
सिरसा ने कहा कि यदि 131वें संविधान संशोधन के माध्यम से सीटों का विस्तार और 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित होता, तो लोकसभा में 200 से अधिक महिलाएं प्रतिनिधित्व करतीं और देशभर में महिला नेतृत्व का एक नया अध्याय शुरू होता। उन्होंने डिलिमिटेशन (परिसीमन) के मुद्दे पर विपक्ष द्वारा फैलाए गए भ्रम की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह संवैधानिक आवश्यकता है, राजनीतिक विकल्प नहीं। जनसंख्या वृद्धि और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सीटों का पुनर्निर्धारण आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होता, बल्कि सभी राज्यों में समान प्रतिनिधित्व का अवसर सुनिश्चित होता है।
सिरसा ने कहा कि डिलिमिटेशन का उद्देश्य हर नागरिक के वोट की समान ताकत सुनिश्चित करना है। जब देश की आबादी 50 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ के करीब पहुंच चुकी, तब संसद और विधानसभाओं में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक आवश्यकता है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता का उल्लेख करते हुए कहा कि भाजपा ने केवल घोषणाएं नहीं कीं, बल्कि महिलाओं को नेतृत्व की मुख्यधारा में लाने का काम किया। उन्होंने सुषमा स्वराज, उमा भारती, वसुंधरा राजे, आनंदीबेन पटेल, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु तथा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि भाजपा ने महिलाओं को सर्वोच्च जिम्मेदारियां देने का कार्य किया है।
सिरसा ने पंजाब की ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि एसजीपीसी के 1925 के अधिनियम के तहत महिलाओं को मतदान का अधिकार देने की शुरुआत भारत की धरती से हुई थी। उन्होंने गुरु नानक देव जी की पंक्ति “सो क्यों मंदा आखिए, जित जन्मे राजान” का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव नारी सम्मान की पक्षधर रही है। उन्होंने कहा कि इतिहास उन लोगों को कभी माफ नहीं करेगा जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के साथ राजनीति की। हमारी बहन-बेटियां भी उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी। नारी सम्मान केवल भाषणों से नहीं, निर्णयों से साबित होता है।
सिरसा ने कहा कि यदि यह विधेयक बिना बाधा के लागू होता, तो संसद से लेकर विधानसभा तक महिलाओं की निर्णायक भागीदारी सुनिश्चित होती और देश की नीति निर्माण प्रक्रिया अधिक समावेशी बनती। उन्होंने विपक्ष द्वारा महिला आरक्षण का विरोध करने की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि यह महिलाओं के अधिकारों के साथ अन्याय है।