रांची 14 अप्रैल । झारखंड उच्च न्यायालय ने धनबाद जिले में 5 दिसंबर 2008 के विज्ञापन से होम गार्डों की भर्ती को चुनौती देने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि यह मामला पीआईएल के दायरे में नहीं आता है।याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन बताते हुए इस विज्ञापन के आधार पर हुई सभी नियुक्तियां रद्द करने, राज्य की विजिलेंस विभाग या सीबीआई जांच की मांग की थी।
खंडपीठ ने कहा कि यह मामला जनहित याचिका के रूप में स्वीकार योग्य नहीं है। यदि किसी उम्मीदवार को शिकायत थी, तो उसे व्यक्तिगत रूप से कोर्ट आना चाहिए था, सेवा मामलों में पीआईएल आमतौर पर स्वीकार नहीं की जाती। वर्ष 2008 की नियुक्तियां अब समाप्त हो चुकी होंगी, इसलिए याचिका अप्रासंगिक हो चुकी है।
याचिकाकर्ताओं ने जिन लोगों की नियुक्तियों को चुनौती दी, उन्हें पक्षकार भी नहीं बनाया। उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है और न ही इसमें अब कोई प्रभावी राहत दी जा सकती है। इसलिए कोर्ट ने बिना किसी लागत के यह जनहित याचिका खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता नागेश्वर राणा और उपेंद्र शर्मा ने दावा किया था कि चयनित उम्मीदवार धनबाद के ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों के निवासी नहीं थे, जो विज्ञापन के क्लॉज-6 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता के वकील ने आरटीआई जानकारी का हवाला देते हुए बताया कि दो उम्मीदवारों के चयन में नियम का उल्लंघन हुआ है। सरकार के वकील ने कहा कि सेवा मामलों में पीआईएल नहीं चलता है। उनकी ओर से उच्चतम न्यायालय के दुर्योधन साहू 1998 और भोलानाथ मुखर्जी 2011 फैसलों का जिक्र किया गया। होम गार्ड भर्ती अधिकतम 4 वर्ष की होती है, 2008 के बाद तीन और भर्तियां हो चुकी।