देहरादून, 27 अगस्त । उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों को देखते हुए राज्य सरकार उनकी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की नियमित वैज्ञानिक निगरानी के साथ अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने और आवश्यकता के अनुसार इनकी संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
मुख्यमंत्री ने आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन को प्रदेश की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन कराने के निर्देश दिए। इसके तहत झीलों की स्थिति, जलस्तर, आकार में होने वाले बदलाव, आसपास के भू-भाग और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों का नियमित आकलन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि संभावित खतरे की स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों तक समय रहते चेतावनी पहुंचाने के लिए आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण, संचार प्रणाली और अन्य तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। साथ ही सुरक्षित निकासी मार्ग, संभावित प्रभावित क्षेत्रों का चिन्हांकन, स्थानीय चेतावनी तंत्र और राहत एवं बचाव की तैयारियों को भी मजबूत किया जाए।
इसी क्रम में आपदा प्रबंधन विभाग की राज्य सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष विनय रुहेला और ले. कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी (सेवानिवृत्त) ने नेपाल में हुई आपदा के बाद उत्तराखंड में संभावित आपदाओं से निपटने की तैयारियों को लेकर जिलाधिकारियों के साथ समीक्षा की है। बैठक में ग्लेशियर झीलों और नदियों के जलस्तर की निगरानी, संवेदनशील स्थलों, अर्ली वार्निंग सिस्टम, संचार व्यवस्था, त्वरित प्रतिक्रिया तथा स्थानीय संसाधनों की समीक्षा की गई। जिलाधिकारियों को अपने-अपने जिलों में संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की नियमित निगरानी करने और किसी भी असामान्य गतिविधि की सूचना तत्काल उच्च स्तर पर देने के निर्देश दिए गए।
बैठक में विनय रुहेला ने कहा कि उत्तराखंड और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां काफी हद तक समान हैं। नेपाल की आपदा से सीख लेते हुए उत्तराखंड में संभावित जोखिमों से निपटने के लिए पहले से तैयारी जरूरी है। उन्होंने संवेदनशील स्थलों की निरंतर निगरानी करने और बांध एवं बैराज प्रबंधकों के साथ नियमित बैठकें करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि बांधों से पानी छोड़े जाने की स्थिति में निचले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को समय रहते अलर्ट किया जाना चाहिए।
आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि उत्तराखंड में 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से चार का सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। शेष झीलों का चरणबद्ध तरीके से सर्वेक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा। उन्होंने बताया कि जल्द ही चमोली स्थित सरस्वती ताल और उत्तरकाशी स्थित केदारताल के सर्वेक्षण के लिए विशेषज्ञ दल रवाना किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सर्वेक्षण में झीलों की वर्तमान स्थिति, जलस्तर, संभावित खतरे के कारकों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी के साथ ऐसी व्यवस्था विकसित की जा रही है, जिससे संभावित खतरे की स्थिति में चेतावनी से लेकर राहत एवं बचाव तक की पूरी श्रृंखला प्रभावी ढंग से काम कर सके। इसके तहत रियल टाइम डेटा प्राप्त करने, अत्याधुनिक सेंसर एवं अर्ली वार्निंग उपकरण लगाने, जरूरत के अनुसार उपकरणों की संख्या बढ़ाने और वैकल्पिक संचार माध्यम विकसित करने पर काम किया जाएगा। संवेदनशील क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को संभावित खतरों और आपदा के दौरान अपनाई जाने वाली सुरक्षित प्रक्रियाओं के बारे में भी जागरूक किया जाएगा।
ले. कर्नल रघुवीर सिंह भंडारी (सेवानिवृत्त) ने कहा कि प्रत्येक आपदा महत्वपूर्ण सीख देती है। नेपाल की घटना से सीख लेते हुए उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन की तैयारियों को और प्रभावी बनाया जाना चाहिए। उन्होंने ग्राम प्रधानों और स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ मजबूत एवं त्वरित संचार नेटवर्क स्थापित करने पर जोर दिया, ताकि आपात स्थिति में चेतावनी और जरूरी सूचना सबसे पहले प्रभावित लोगों तक पहुंच सके।