रांची, 30 सितंबर । झारखंड उच्च न्यायालय ने आईआईटी-आईएसएम धनबाद के कर्मचारियों से जुड़े 20 से अधिक मामलों में केंद्र सरकार की अपीलों का निस्तारण करते हुए उन्हें जीपीएफ-कम-पेंशन योजना का लाभ देने का आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि एक जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों से सीपीएफ योजना में बने रहने का विकल्प मांगना ही संस्थान की गलती थी। इस गलती का खामियाजा कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए।
मामला तत्कालीन इंडियन स्कूल ऑफ माइंस (अब आईआईटी-आईएसएम धनबाद) के कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने चौथे वेतन आयोग की सिफारिशें एक जनवरी 1986 से लागू की थीं। इसके बाद एक मई 1987 के कार्यालय ज्ञापन के तहत सीपीएफ योजना में शामिल केंद्रीय कर्मचारियों को सामान्य रूप से जीपीएफ-पेंशन योजना में आने का प्रावधान किया गया था।
आईएसएम ने 19 दिसंबर 1987 को अपने कर्मचारियों से सीपीएफ में बने रहने अथवा जीपीएफ-कम-पेंशन योजना में जाने के लिए विकल्प मांगा था। बाद में तीन जनवरी 1994 को संस्थान ने स्पष्ट किया कि एक जनवरी 1986 के बाद नियुक्त नए कर्मचारियों को केवल जीपीएफ योजना का लाभ मिलेगा। इसके बावजूद कई कर्मचारियों को सीपीएफ योजना में रखा गया।
मामला संस्थान के कार्यकारी बोर्ड के समक्ष पहुंचा। वर्ष 2005 में बोर्ड ने माना कि एक जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को जीपीएफ-कम-पेंशन योजना के तहत रखा जाना चाहिए। हालांकि तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस निर्णय पर सहमति नहीं दी।
इसके बाद गठित समिति की सिफारिश पर वर्ष 2017 में आईआईटी-आईएसएम के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने कर्मचारियों को जीपीएफ-कम-पेंशन योजना में रखने का निर्णय लिया। एक सितंबर 2017 के कार्यालय आदेश के तहत कर्मचारियों को नियुक्ति की तारीख से जीपीएफ-कम-पेंशन योजना में शामिल किया गया और उनका योगदान जीपीएफ खातों में स्थानांतरित किया गया। हालांकि, मंत्रालय की आपत्ति के बाद संस्थान ने इस आदेश को स्थगित कर दिया। वर्ष 2019 में बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ने कर्मचारियों को दोबारा सीपीएफ योजना में वापस कर दिया। कर्मचारियों ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
खंडपीठ ने आज कहा कि एक जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों से सीपीएफ में बने रहने का विकल्प मांगने का कोई आधार नहीं था। संस्थान ने भी बाद में स्वीकार किया कि विकल्प मांगना उसकी गलती थी। अदालत ने उच्चतम न्यायालय के ‘साक्षी किरण’ मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि सामान्य रूप से कर्मचारी जीपीएफ योजना के दायरे में थे और सीपीएफ उनके लिए अपवाद था।
अदालत ने कहा कि जब संस्थान ने गलत तरीके से कर्मचारियों से विकल्प मांगा था, तो केवल इस आधार पर कि कर्मचारियों ने सीपीएफ चुना और लंबे समय तक उसमें बने रहे, उन्हें जीपीएफ-कम-पेंशन योजना से वंचित नहीं किया जा सकता।
केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि जीपीएफ-कम-पेंशन योजना लागू करने से केंद्र पर वित्तीय बोझ पड़ेगा और इसके लिए केंद्र की पूर्व अनुमति आवश्यक थी। इस पर खंडपीठ ने कहा कि केवल वित्तीय बोझ के आधार पर कर्मचारियों के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, संस्थान ने कर्मचारियों को कोई नया लाभ नहीं दिया, बल्कि अपनी पूर्व की गलती को सुधारा है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि केंद्र की पूर्व अनुमति लेना आवश्यक माना भी जाए तो यह अधिक से अधिक प्रक्रियात्मक त्रुटि होगी। केवल ऐसी प्रक्रिया संबंधी त्रुटि के आधार पर वैध निर्णय को तब तक निरस्त नहीं किया जा सकता, जब तक उससे मौलिक न्याय की विफलता या किसी पक्ष को वास्तविक नुकसान न हुआ हो।
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि सभी संबंधित कर्मचारियों को जीपीएफ-कम-पेंशन योजना के तहत माना जाए। जो कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं और जिन्हें अभी सीपीएफ का लाभ नहीं मिला है, उन्हें जीपीएफ-कम-पेंशन योजना के तहत पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं। वहीं, जिन सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सीपीएफ का लाभ पहले ही मिल चुका है, उन्हें जीपीएफ के तहत पेंशन तभी मिलेगी, जब वे आईआईटी-आईएसएम धनबाद की ओर से सीपीएफ योजना में किए गए सरकारी अंशदान को वापस करेंगे।
इस तरह खंडपीठ ने एकल पीठ के चार जनवरी 2024 और 27 फरवरी 2024 के आदेशों को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की अपीलों का निस्तारण कर दिया।