प्रयागराज, 04 नवंबर । इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के राजकीय मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के स्वीकृत पदों पर भर्ती न होने को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग को पक्षकार बनाने की अनुमति दी है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने श्रीनिवासन गांधी की याचिका की सुनवाई करते हुए अगली तारीख 25 नवंबर को राज्य सरकार और आयोग से शपथपत्र मांगे हैं।
सरकारी अधिवक्ता ने बताया कि प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के कुल 517 स्वीकृत पद हैं। इनमें 25 प्रतिशत सीधी भर्ती और 75 प्रतिशत पदोन्नति से भरे जाने हैं। सीधी भर्ती के 108 पदों में से सिर्फ 26 पर ही तैनाती है, यानी 75 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त हैं।
राज्य सरकार ने 35 पदों की मांग आयोग को भेजी, लेकिन आज तक विज्ञापन जारी नहीं हुआ। याचिका दायर होने के बाद ही 18 अगस्त 2026 को 44 पदों का विज्ञापन निकाला गया। जिसकी चयन प्रक्रिया चल रही है। सरकार ने 14 जून 2024 के शासनादेश का हवाला दिया, जिसके तहत प्राचार्यों को वॉक-इन-इंटरव्यू से नियुक्ति का अधिकार है। सरकार के अनुसार यह व्यवस्था कॉलेजों का कामकाज चलाने के लिए की गई।
कोर्ट ने कहा कि नियमित पद न भरकर “कृत्रिम आपात स्थिति” बनाई जा रही है, जिससे संविदा नियुक्तियां होती हैं। कई कॉलेजों में विभागाध्यक्ष जैसे अहम पद संविदा कर्मियों या असिस्टेंट/एसोसिएट प्रोफेसरों के भरोसे हैं, जबकि प्रोफेसर के पद स्वीकृत हैं। कोर्ट ने इसे मेडिकल कॉलेजों के गिरते मानकों का एक कारण माना और कहा कि वह वैधानिक आवश्यकताओं के अनुसार रिक्तियां न भरने के मूल मुद्दे से आंखें नहीं मूंद सकता। याची को दूसरे तदर्थ कर्मचारी से बदले जाने का प्रयास भी स्थापित विधि के विरुद्ध बताया गया।
30 जनवरी 2026 की अधिसूचना से “उत्तर प्रदेश विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड” के गठन का निर्णय हुआ था, लेकिन 10 महीने से अधिक बीतने पर भी बोर्ड नहीं बना। नियुक्ति की जिम्मेदारी अब भी लोक सेवा आयोग के पास है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि तय तारीख तक शपथपत्र दाखिल न होने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उचित आदेश पारित किए जाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को दोपहर 2 बजे होगी।
